एकादशी व्रत
भगवान विष्णु
हर पक्ष (शुक्ल और कृष्ण) की ग्यारहवीं तिथि एकादशी कहलाती है और भगवान विष्णु को समर्पित है। साल में सामान्यतः 24 एकादशी आती हैं (अधिक मास में 26)।
नियम
- दशमी की शाम सूर्यास्त से पहले सात्त्विक, हल्का भोजन करें।
- एकादशी को अन्न (चावल, गेहूँ, दालें), प्याज-लहसुन, मांस और मदिरा से दूर रहें। फल, दूध, मेवे, साबूदाना, कुट्टू/सिंघाड़े का आटा और आलू परंपरा में चलते हैं।
- तुलसी के पत्ते एकादशी को न तोड़ें — दशमी या उससे पहले तोड़कर रख लें।
- दिन में सोने, क्रोध और कठोर बोली से बचें; भजन-कीर्तन और विष्णु नाम-जप करें।
पूजन सामग्री
भगवान विष्णु की प्रतिमा/चित्र या शालिग्राम, पीला वस्त्र, पीले फूल, तुलसी पत्र, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर), फल, धूप, घी का दीपक, चंदन/रोली, अक्षत।
पूजा विधि
- प्रातः स्नान करके साफ़ वस्त्र पहनें और पूजा-स्थान स्वच्छ करें।
- हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत का संकल्प करें: “मैं भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए एकादशी का व्रत करता/करती हूँ।”
- चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा/चित्र स्थापित करें और दीपक जलाएँ।
- जल व पंचामृत से अभिषेक करें, फिर चंदन-रोली, पीले फूल और तुलसी पत्र अर्पित करें।
- धूप-दीप दिखाकर फल व मिष्ठान्न का भोग लगाएँ (भोग में तुलसी अवश्य रखें)।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का 108 बार जप करें; चाहें तो विष्णु सहस्रनाम पढ़ें।
- एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें, फिर आरती करें (ॐ जय जगदीश हरे) और प्रसाद बाँटें।
- शाम को तुलसी के पास दीपक जलाएँ; रात में भजन या जागरण करें।
पारण (व्रत खोलना)
पारण द्वादशी के दिन सूर्योदय के बाद, द्वादशी तिथि के भीतर करें और हरि-वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) में पारण न करें। पहले तुलसी-जल या प्रसाद लें, फिर सात्त्विक अन्न ग्रहण करें और यथाशक्ति दान दें। सटीक पारण-समय के लिए स्थानीय पंचांग देखें।
कथा — एकादशी की उत्पत्ति की कथा
पुराणों में कथा आती है कि सत्ययुग में मुर नाम का बलशाली दैत्य था। उसने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया। दुखी देवता भगवान शिव के पास गए, और शिव जी ने उन्हें भगवान विष्णु की शरण में भेजा।
विष्णु जी ने मुर से बहुत समय तक युद्ध किया। थककर वे बद्रिकाश्रम की एक गुफ़ा (हिमावती) में विश्राम करने लगे। मुर ने सोते हुए प्रभु पर आक्रमण करना चाहा।
तभी भगवान के शरीर से एक तेजस्वी कन्या प्रकट हुई और उसने मुर का वध कर दिया। जागने पर विष्णु जी प्रसन्न हुए। कन्या ने कहा कि वह उन्हीं की शक्ति से उत्पन्न एकादशी है।
प्रभु ने उसे वरदान दिया कि जो श्रद्धा से इस तिथि का व्रत करेगा, उसके पाप क्षीण होंगे और वह विष्णु-धाम का अधिकारी होगा। तभी से एकादशी का व्रत किया जाता है।
परंपरागत कथा का संक्षिप्त पुनःकथन; अलग-अलग ग्रंथों और क्षेत्रों में रूप थोड़ा भिन्न मिलता है।
स्मार्त और वैष्णव परंपराओं में, विशेषकर जब दशमी एकादशी में मिली हो, व्रत का दिन अलग हो सकता है। अपनी परंपरा के अनुसार चलें।