अमावस्या — पितृ-स्मरण, स्नान और दान
पितृ (पूर्वज), भगवान विष्णु व शिव
अमावस्या (अमावस) कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि है। इसे पितरों के स्मरण, तर्पण, दान और स्नान की तिथि माना जाता है। सोमवार को पड़े तो सोमवती अमावस्या, शनिवार को शनि अमावस्या और माघ में मौनी अमावस्या कहलाती है।
नियम
- प्रातः नदी या घर पर स्नान करें; संभव हो तो गंगा-जल मिलाएँ।
- तर्पण और पितरों के नाम से दान — अन्न, वस्त्र, तिल, कंबल (सर्दी में)।
- गाय, कुत्ते, कौए और चींटियों को भोजन दें।
- परंपरा में इस दिन नए शुभ कार्य शुरू करने से बचा जाता है; सात्त्विक भोजन करें।
पूजन सामग्री
कुशा, काले तिल, जल, दूध, चावल/जौ, तांबे या पीतल का पात्र, सात्त्विक भोजन, दीपक (घी या सरसों का तेल)।
पूजा विधि
- स्नान के बाद साफ़ वस्त्र पहनकर संकल्प लें।
- दक्षिण दिशा की ओर मुख करके कुशा, काले तिल, जल (और थोड़ा दूध) से पितरों को जलांजलि दें।
- घर पर बना सात्त्विक भोजन पितरों के निमित्त निकालें और गाय, कुत्ते व कौए को दें।
- ज़रूरतमंद या ब्राह्मण को भोजन/दान दें।
- शाम को पीपल के नीचे या घर के दक्षिण कोने में दीपक जलाएँ और पितरों का स्मरण करें।
- “ॐ पितृ देवाय नमः” का जप करें और शिव/विष्णु जी का स्मरण करें।
कथा — कर्ण और पितरों के भोजन की कथा (लोक-परंपरा)
लोक-परंपरा में कथा आती है कि महाभारत के दानवीर कर्ण ने जीवन भर सोना-चाँदी दान किया, पर अन्न का दान नहीं किया। मृत्यु के बाद स्वर्ग में उन्हें भोजन के रूप में सोना ही मिला।
कर्ण ने कारण पूछा तो इंद्र ने बताया कि उसने कभी अन्न-जल से पितरों और ज़रूरतमंदों की सेवा नहीं की। तब कर्ण को पृथ्वी पर लौटकर अन्न और जल का दान करने का अवसर दिया गया।
माना जाता है कि वही अवधि पितृपक्ष कहलाई। कथा की सीख है कि पूर्वजों के निमित्त अन्न-जल का दान सबसे बड़ा स्मरण है।
परंपरागत कथा का संक्षिप्त पुनःकथन; अलग-अलग ग्रंथों और क्षेत्रों में रूप थोड़ा भिन्न मिलता है।
सर्वपितृ अमावस्या (आश्विन) पर श्राद्ध की पूरी विधि के लिए श्राद्ध वाला पृष्ठ देखें।