करवा चौथ

कार्तिक कृष्ण चतुर्थी

तिथि और समय

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026
तिथि: 29/10 01:07 से 29/10 22:10 तक (IST)
सूर्यास्त 5:39 PM (दिल्ली)
सोमवार, 18 अक्टूबर 2027
तिथि 18 अक्टूबर 2027 और 19 अक्टूबर 2027 दोनों दिन रहती है — परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार दिन तय करें।
तिथि: 18/10 17:52 से 19/10 16:42 तक (IST)
सूर्यास्त 5:49 PM (दिल्ली)
शनिवार, 7 अक्टूबर 2028
तिथि: 07/10 03:35 से 08/10 04:51 तक (IST)
सूर्यास्त 6:00 PM (दिल्ली)

पूजा संध्या काल (सूर्यास्त के आसपास) में होती है। व्रत खोलने का समय चंद्रोदय पर निर्भर है, जो हर शहर में अलग होता है — अपने शहर का चंद्रोदय समय देखें।

महत्त्व

करवा चौथ उत्तर भारत में विवाहित स्त्रियों द्वारा पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य की कामना से रखा जाने वाला व्रत है। व्रत सूर्योदय से चंद्रोदय तक रखा जाता है और चंद्रमा को अर्घ्य देकर खोला जाता है।

पूजा सामग्री

करवा (मिट्टी/धातु का पात्र) और जल, छलनी, दीपक, रोली, चावल, मिठाई, फल, सिंदूर-श्रृंगार सामग्री, गणेश-गौरी की प्रतिमा या चित्र

पूजा विधि

  1. सूर्योदय से पहले “सरगी” (सास या घर की बड़ी महिला का दिया भोजन) ग्रहण करके व्रत का संकल्प लें।
  2. दिन भर व्रत रखें और शाम को स्नान करके सजें; पूजा-स्थान पर गणेश, गौरी, शिव-पार्वती और करवा माता की स्थापना करें।
  3. करवे में जल भरकर रखें, दीपक जलाएँ और रोली-अक्षत-फूल चढ़ाएँ।
  4. समूह में बैठकर करवा चौथ की कथा सुनें और करवे आपस में बदलने (फेरने) की परंपरा निभाएँ।
  5. चंद्रोदय होने पर छलनी से चंद्रमा को देखें, अर्घ्य दें, फिर उसी छलनी से पति को देखें।
  6. पति के हाथ से जल और मिठाई लेकर व्रत खोलें, फिर भोजन करें।

ॐ शिवायै नमः

कथा

प्रचलित कथा में वीरावती नाम की राजकुमारी थी, जिसके सात भाई थे। विवाह के बाद पहले करवा चौथ पर वह मायके में थी और भूख-प्यास से व्याकुल हो गई। भाइयों ने उसका कष्ट देखकर पेड़ के पीछे दीपक रखकर उसे चाँद निकलने का भ्रम दिया और उसने व्रत खोल दिया। उसी समय पति की मृत्यु का समाचार आया। वीरावती ने विलाप किया; देवी की कृपा से उसे अपनी भूल का ज्ञान हुआ और अगले वर्ष विधि से व्रत करने पर पति को फिर जीवन मिला। एक और प्रचलित कथा सावित्री और करवा से भी जुड़ी है।

निर्जल उपवास स्वास्थ्य की स्थिति देखकर ही रखें। गर्भवती, बीमार, मधुमेह या अन्य रोगों से पीड़ित स्त्रियाँ जल या फल ले सकती हैं और ज़रूरत हो तो डॉक्टर या अपने पंडित से सलाह लें।

यह प्रचलित परंपरा के आधार पर लिखी संक्षिप्त कथा और विधि है। क्षेत्र, परिवार और संप्रदाय के अनुसार रीति-रिवाज बदल सकते हैं; अपनी परंपरा या पंडित जी के निर्देश को प्राथमिकता दें। तिथि दिल्ली के लिए गणना की गई है।

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